
उत्तरकाशी। यमुनोत्री धाम की यात्रा जहां आस्था और श्रद्धा का विराट स्वरूप प्रस्तुत करती है, वहीं यात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ पैदा होने वाला कचरा हिमालय के इस संवेदनशील क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। धाम और पैदल मार्ग से सामने आई तस्वीरें इस समस्या की गंभीरता को साफ तौर पर दिखाती हैं। कहीं प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां, कपड़े और पूजा-सामग्री के अवशेष जमा हैं तो कहीं इन्हें बोरों में भरकर खच्चरों के जरिए नीचे लाया जा रहा है। सीमित स्थान और दुर्गम पैदल मार्ग के कारण यहां कचरे का निस्तारण मैदानी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक कठिन है।
यात्रा के दूसरे चरण को देखते हुए जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने 11 सितम्बर को यमुनोत्री धाम का निरीक्षण किया था। इस दौरान मंदिर समिति के सचिव सुनील उनियाल से मंदिर परिसर में एकत्र कूड़े और पूजा-सामग्री के अवशेषों के निस्तारण की स्थिति की जानकारी ली गई। प्रशासन के अनुसार वर्षाकाल में अवशेष भीग जाने से उन्हें तत्काल नीचे पहुंचाने में कठिनाई हुई और धाम क्षेत्र में बड़ी मात्रा में कचरा जमा हो गया। बारिश थमने के बाद इसे हटाने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए गए।
इसके बाद पर्यटन विभाग की अधिकृत कार्यदायी संस्था सुलभ इंटरनेशनल ने जानकीचट्टी बैरियर से मुख्य मंदिर परिसर तक सफाई और कचरा निस्तारण अभियान तेज किया है। जिला पर्यटन विकास अधिकारी के अनुसार पूरे पैदल मार्ग पर 40 पर्यावरण मित्र और चार पर्यवेक्षक तैनात किए गए हैं। ये कर्मचारी मार्ग की सफाई के साथ ठोस कचरा एकत्र कर उसे जानकीचट्टी स्थित निस्तारण स्थल तक पहुंचा रहे हैं।
सबसे बड़ी चुनौती मंदिर क्षेत्र में जमा पूजा-सामग्री और अन्य अवशेषों को सड़क तक पहुंचाने की है। इसके लिए खच्चरों का सहारा लिया जा रहा है। सुलभ इंटरनेशनल के अनुसार पूर्व में करीब एक महीने तक प्रतिदिन लगभग 15 खच्चरों के माध्यम से औसतन 30 कट्टे कचरा नीचे लाया गया। प्रत्येक कट्टे का वजन लगभग 45 से 50 किलोग्राम बताया गया है। इस हिसाब से प्रतिदिन करीब 1,350 से 1,500 किलोग्राम, यानी लगभग डेढ़ टन तक सामग्री नीचे पहुंचाई गई। 18 सितम्बर से 15 अतिरिक्त खच्चरों की टोली फिर तैनात की गई है। तस्वीरों में खच्चरों पर लदे कचरे के भारी बोरे और दूसरी ओर सफाईकर्मियों द्वारा बड़ी मात्रा में बिखरे प्लास्टिक, कपड़े तथा अन्य सामग्री को अलग-अलग बोरों में भरते हुए देखा जा सकता है। ये दृश्य यमुनोत्री जैसे उच्च हिमालयी तीर्थस्थल में तीर्थयात्रा के साथ पैदा होने वाले अपशिष्ट के प्रबंधन की कठिनाई को भी रेखांकित करते हैं। जिला प्रशासन ने संस्था को यात्रा सत्र समाप्त होने तक सफाई, कचरा एकत्रीकरण और उसके परिवहन की व्यवस्था लगातार जारी रखने के निर्देश दिए हैं। साथ ही धार्मिक अवशेषों के व्यवस्थित प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया है।
यमुनोत्री की ये तस्वीरें एक बड़ा सवाल भी सामने रखती हैंकृहिमालयी तीर्थों में बढ़ती यात्री संख्या के साथ क्या केवल सफाई अभियान पर्याप्त हैं, या अब ऐसी स्थायी व्यवस्था की जरूरत है जिसमें कचरा पैदा होने से रोकने, प्लास्टिक का उपयोग घटाने और प्रत्येक यात्री की जिम्मेदारी तय करने को भी यात्रा प्रबंधन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए?










