उतराखंडस्वास्थ्य

जन्म के पहले घंटे में मां का दूध शिशु के स्वास्थ्य की मजबूत नींव

शिशु-मृत्यु दर को कम करने के लिए स्तनपान के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव जरूरी -

एम्स में विश्व स्तनपान सप्ताह आयोजित

एम्स ऋषिकेश,11 अगस्त। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के तत्वावधान में ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ मनाया गया। सप्ताह भर तक चले इस जागरूकता सप्ताह के दौरान विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए शिशु के स्वास्थ्य के लिए मां के दूध के महत्व पर विशेष जोर दिया गया।

कार्यक्रम में बताया गया कि इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा “सतत जीवन की शुरुआत के लिए स्तनपान: जो कारगर है उसे मजबूत करें” थीम निर्धारित की गई थी। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि और एम्स की कार्यकारी निदेशक प्रो. (डॉ.) मीनू सिंह ने अपने संबोधन में स्तनपान को शिशु सुरक्षा का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चक्र बताया। प्रो. मीनू सिंह ने कहा, “शिशु और बाल मृत्यु दर को कम करने में स्तनपान की भूमिका सबसे अहम है। मां का पहला गाढ़ा दूध (कोलोस्ट्रम) शिशु के लिए प्राकृतिक टीके के रूप में काम करता है, जो उसे जीवनभर गंभीर बीमारियों से बचाता है। उन्होंने कहा कि समाज में इस विषय को लेकर केवल माताओं को नहीं, बल्कि पूरे परिवार को जागरूक करने की जरूरत है ताकि कामकाजी माताएं भी बिना किसी बाधा के स्तनपान जारी रख सकें।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित डीन (एकेडमिक्स) प्रो. (डॉ.) सौरभ वार्ष्णेय ने कहा, “स्तनपान के लाभों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने में हमारे मेडिकल विद्यार्थियों और युवा डॉक्टरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा में इस विषय पर लगातार शोध और व्यावहारिक प्रशिक्षण की भी आवश्यकता है। हमारे नवोदित डॉक्टरों को भविष्य में क्लीनिकल प्रैक्टिस के साथ-साथ इस सामाजिक जागरूकता अभियान का नेतृत्व भी करना होगा, ताकि कुपोषण मुक्त समाज की परिकल्पना को साकार किया जा सके।

सामुदायिक चिकित्सा विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) वर्तिका सक्सेना ने बताया कि जन्म के पहले घंटे में स्तनपान और शुरुआती छह महीनों तक केवल मां का दूध ही शिशु के स्वस्थ जीवन की असली नींव है। इसे सफल बनाने के लिए परिवार, स्वास्थ्य तंत्र और कार्यस्थल (वर्कप्लेस) का सहयोग बेहद अनिवार्य है। विशेषज्ञों ने बताया कि अस्पताल में सुरक्षित प्रसव (संस्थागत डिलीवरी) की दर 80 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद, जागरूकता की कमी के कारण केवल 40 प्रतिशत माताएं ही जन्म के पहले घंटे के भीतर शिशु को स्तनपान करा पाती हैं। इस अंतर को पाटने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता की जरूरत बतायी गयी।

इंसेट-
“काम भी, मां भी” विषय पर अनूठी पहल
ऋषिकेश। जागरूकता सप्ताह का समापन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) रायवाला में हुआ। इस मौके पर इंटर्न चिकित्सकों ने एक शानदार नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत कर स्तनपान से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों पर प्रहार किया। साथ ही “स्तनपान कराने वाली पत्नी के सहयोग में पति की भूमिका” पर व्याख्यान भी दिया गया। कार्यक्रम में क्षेत्र की 18 से अधिक आशा कार्यकर्ताओं ने भाग लिया, जिनमें से उत्कृष्ट कार्य करने वाली आशाओं को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर डॉ. स्मिता सिन्हा, डॉ. गार्गी पांडेय, डॉ. एकता पाठक, डॉ. नीलांजन सहित विभाग के कई डॉक्टर्स और मेडिकल छात्र उपस्थित रहे।

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