
देहरादून। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर उत्तराखंड की भाषाओं की पक्षधरता में धाद ने सार्वजनिक आयोजन के साथ भाषा संवाद के कार्यक्रम भाषा बच्यायो यानी भाषा बोलो संचालित करने का तय किया है। इसके साथ ही उसके पक्ष में मांगपत्र भी भाषा मंत्री और भाषा संस्थान की निदेशक को भेंट किया गया। प्रतिनिधिमंडल में हर्षमणि व्यास, उत्तम सिंह रावत, .एस.रावत, गणेश चंद्र उनियाल, तन्मय ममगाईं और नीलेश शामिल थे। धाद के सचिव तन्मय ने बताया कि धाद की स्थापना चार दशक पहले भाषाई चेतना के साथ लोकभाषा सम्मलेन और उसके साहित्य प्रकाशन के साथ ही हुई। उत्तराखंड की भाषाओं के सवाल को दुनिया की भाषाओं के साथ जोड़ते हुए धाद ने 2010 में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर पहल प्रारम्भ की जो आज भी जारी है। जिसका विचार था कि दुनिया की सभी भाषाओं की तरह मेरी भाषा भी प्रवाहमान रहे, समृद्ध हो। मातृभाषा एकांश की प्रभारी माधुरी रावत ने बताया कि इस वर्ष भी तीन दिवसीय सार्वजनिक आयोजन के साथ मातृभाषा एकांश ने पहल की है जिसमें ऑनलाइन विमर्श में भाषा के सवाल के साथ ही कोटद्वार में कवि सम्मेलन, नाटक और सम्मान समारोह रखा गया है। इसके साथ धाद स्मृति वन में गढ़वाल के मुहावरों को सुनने सुनाने के साथ भाषा सीखने और पहाड़ के खाने का आयोजन भी किया गया है। इसके साथ ही संस्कृति कर्मी शान्ति बिंजोला के संयोजन में भाषा बच्यायो के अंतर्गत भाषा संवाद और शिक्षण का कार्यक्रम आगामी मार्च से प्रारम्भ होगा। भाषा मंत्री और भाषा संस्थान की निदेशक मायावती ढकरियाल को मांगपत्र सौंपने गए धाद के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व कर रहे हर्षमणि व्यास ने कहा कि समाज और सरकारी स्तर पर अपनी मातृभाषाओं का महत्व न होने से उत्तराखण्ड की नई पीढ़ी में भी अपनी मातृभाषा के प्रति अलगाव की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। यह हमारी भाषाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती और चिंता तो है ही हमारी सांस्कृतिक पहचान के लिए भी खतरा है। इसलिए अब हमें भाषा संवाद और शिक्षण पर पहल करनी होगी।
शासन को सौंपा गया मांगपत्र
◆ भाषा संवाद फेलोशिप की घोषणा हो जिसमे उत्तराखंड की भाषाओं को आम समाज में सीखाने का लक्ष्य ले कर काम किया जाय।
◆ नयी पीढ़ी को मातृभाषाओं से जोडने के लिए भाषा स्कूलों की स्थापना हो।
◆ प्रदेश सरकार हर वर्ष लोकभाषा सप्ताह मनाएं जिसमे सभी शासकीय कार्यालयों, संस्थानों, सरकारी, गैर सरकारी स्कूलों में भाषाओं के आयोजन हो।
◆ राज्य के माध्यमिक से लेकर उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में और लोक सेवा परीक्षाओं में तीस प्रतिशत स्थानीय साहित्य, इतिहास, संस्कृति, व प्रदर्शन कलाओं से सम्बन्धित विषय शामिल हों।
◆ प्रदेश सरकार उत्तराखण्ड की गढ़वाली और कुमाउनी भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केन्द्र सरकार को अविलंब प्रस्ताव प्रेषित करे।












