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संस्कृत भारत की भाषाई और सांस्कृतिक एकता की स्वर्णिम डोर : उपराष्ट्रपति

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के द्वितीय दीक्षांत समारोह में 1497 विद्यार्थियों को उपाधियां; भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने पर जोर

नई दिल्ली, 6 अक्टूबर।श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का द्वितीय दीक्षांत समारोह मंगलवार को भारतीय ज्ञान-परंपरा की गरिमा, संस्कृत की शास्त्रीय चेतना और नवभारत की युवा ऊर्जा के भव्य संगम के रूप में सम्पन्न हुआ। भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने मुख्य अतिथि के रूप में संस्कृत को भारत की विविध भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं को एक सूत्र में बांधने वाली ‘स्वर्णिम डोर’ बताते हुए इसे विश्व के ज्ञान-विमर्श तक पहुंचाने का आह्वान किया। समारोह में केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकान्त मजूमदार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

समारोह में विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों के 1497 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से अलंकृत किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, सरस्वती वंदना और मंगलाचरण से आरंभ हुआ समारोह विद्यार्थियों के लिए उपलब्धि के साथ-साथ नई जिम्मेदारियों के संकल्प का अवसर भी बना।

संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारत की ज्ञान-चेतना का सेतु है

उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की प्रत्येक भाषा अपने भीतर एक समृद्ध सभ्यता और संस्कृति को समेटे हुए है, किंतु संस्कृत वह स्वर्णिम सूत्र है, जो भारतीय भाषाओं, दर्शन और ज्ञान-परंपरा को एक व्यापक सांस्कृतिक चेतना से जोड़ता है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा मानना उसके विराट स्वरूप को सीमित करना होगा। दर्शन, साहित्य, गणित, विज्ञान, ज्योतिष, चिकित्सा और आध्यात्मिक चिंतन सहित अनेक क्षेत्रों में संस्कृत में संचित ज्ञान मानवता की अमूल्य धरोहर है। आवश्यकता है कि इस ज्ञान को आधुनिक शोध, तकनीक और वैश्विक संवाद के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

उन्होंने कहा कि संस्कृत की पहुंच विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसे विश्व के विभिन्न देशों के विद्यार्थियों और शोधार्थियों तक पहुंचाने के लिए विश्वविद्यालय को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग और शोध के नए अवसर विकसित करने चाहिए।

ए++ ग्रेड ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उत्कृष्टता को नई पहचान दी

उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय को नैक ए++ ग्रेड प्राप्त होने पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक और समस्त विश्वविद्यालय परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि संस्कृत विद्यापीठ से डीम्ड विश्वविद्यालय और उसके बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के रूप में विकसित होना संस्थान की निरंतर शैक्षणिक यात्रा और सामूहिक प्रयासों का प्रमाण है।

उन्होंने विश्वविद्यालय से संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता के अग्रणी केंद्र के रूप में अपनी पहचान और मजबूत करने की अपेक्षा की।

लाल बहादुर शास्त्री का स्वप्न और विश्वविद्यालय की वैश्विक भूमिका

उपराष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के संस्थापक एवं पूर्व प्रधानमंत्री श्रद्धेय लाल बहादुर शास्त्री की दूरदर्शी परिकल्पना का स्मरण करते हुए कहा कि उनका स्वप्न था कि विश्व के विभिन्न देशों से लोग भारत आएं और संस्कृत का अध्ययन करें।

उन्होंने कहा कि आज विश्वविद्यालय के पास उस परिकल्पना को वैश्विक स्वरूप देने के लिए आवश्यक शैक्षणिक क्षमता और संस्थागत आधार मौजूद है। संस्कृत शिक्षा, शोध, पांडुलिपि संरक्षण और भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक स्तर पर पहुंचाने की दिशा में विश्वविद्यालय को अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

पांडुलिपियों में सुरक्षित है भारत की ज्ञान-सम्पदा

उपराष्ट्रपति ने दुर्लभ एवं अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और प्रकाशन को अत्यंत महत्वपूर्ण दायित्व बताया। उन्होंने कहा कि देश और विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षित पांडुलिपियों में मानव सभ्यता के लिए अत्यंत मूल्यवान ज्ञान मौजूद है।

उन्होंने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ को इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताते हुए कहा कि पांडुलिपियों का संरक्षण केवल अतीत को सुरक्षित करना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ज्ञान के नए द्वार खोलना है। उन्होंने विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से इस अभियान को अकादमिक ऊर्जा देने का आह्वान किया।

संस्कृत और आधुनिक तकनीक का संगम भविष्य की आवश्यकता : सुकान्त मजूमदार

केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री सुकान्त मजूमदार ने कहा कि भारत अपनी प्राचीन ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय से विकास की नई दिशा तय कर रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भारतीय भाषाओं और भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा के केंद्र में लाकर इस परिवर्तन को गति प्रदान की है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत के साथ विद्यार्थियों को कंप्यूटर, आधुनिक भाषाविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। संस्कृत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समन्वय भाषा-प्रौद्योगिकी तथा ज्ञान के नए क्षेत्रों के विकास का आधार बन सकता है।

उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी संस्कृति और परंपरा पर गर्व करते हुए आधुनिक ज्ञान और कौशल से स्वयं को सशक्त बनाने तथा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।

भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भ देना विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता : कुलपति

कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने अपने स्वागत उद्बोधन में उपराष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा राज्य मंत्री एवं सभी विशिष्ट अतिथियों का अभिनंदन करते हुए विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और विकास यात्रा का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार की नई संभावनाओं को विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल संस्कृत के पारंपरिक अध्ययन तक सीमित नहीं है। भारतीय ज्ञान को समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर उसे राष्ट्रीय और वैश्विक विमर्श में प्रभावशाली स्थान दिलाना संस्थान की प्राथमिकताओं में है।

कुलपति ने विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि उपाधि उनके शैक्षणिक जीवन की उपलब्धि का प्रमाण है, किंतु इसके साथ समाज और राष्ट्र के प्रति उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से ज्ञान को संस्कार, कौशल को सेवा और शिक्षा को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का आह्वान किया।

दीक्षांत के बाद शुरू होती है वास्तविक परीक्षा

उपराष्ट्रपति ने उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को जीवनभर सीखते रहने का संदेश देते हुए कहा कि दीक्षांत शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि नई यात्रा का शुभारंभ है।उन्होंने विद्यार्थियों से बदलती दुनिया के अनुरूप अपने ज्ञान को निरंतर अद्यतन करने, कठिनाइयों का धैर्य से सामना करने और अनुशासन को जीवन का आधार बनाने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि माता-पिता का त्याग और आचार्यों का मार्गदर्शन जीवन की ऐसी पूंजी है, जो कठिन समय में सही दिशा दिखाती है। विद्यार्थियों को अपने ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए करना चाहिए।

विविधता में एकता ही भारत की शक्ति

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं, परंपराओं, संस्कृतियों और त्योहारों का देश है, फिर भी इन विविधताओं के बीच एक अदृश्य सांस्कृतिक सूत्र देश को एकता में बांधे रखता है। उन्होंने विद्यार्थियों से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को जीवन में उतारने का आह्वान किया।

उन्होंने युवाओं से नशीले पदार्थों से दूर रहने, स्वस्थ एवं अनुशासित जीवन अपनाने, खेल और रचनात्मक गतिविधियों से जुड़ने तथा सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग करने की अपील की।

उपाधियों के साथ मिला भविष्य का दायित्व

समारोह में 1497 छात्र-छात्राओं को उपाधियां प्रदान की गईं। मेधावी विद्यार्थियों को स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ‘शोध प्रभा’, ‘आम्नाय कल्पतरु’ एवं ‘विद्यामृतम् ग्रंथ’का विमोचन उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन के कर-कमलों से हुआ।

दीक्षांत समारोह में उपाधि प्राप्त करते विद्यार्थियों के चेहरे पर उपलब्धि का गौरव और भविष्य के प्रति उत्साह देखते ही बनता था। सभागार में उपस्थित अभिभावकों और विश्वविद्यालय परिवार के लिए भी यह क्षण गर्व, प्रसन्नता और भावनात्मक आत्मीयता से भरा रहा।

विश्वविद्यालय परिवार की गरिमामय उपस्थिति

समारोह में विश्वविद्यालय कोर्ट के सदस्य, कार्यपरिषद के सदस्य, कुलसचिव प्रोफेसर पवन कुमार शर्मा, वित्त अधिकारी संतोष कुमार श्रीवास्तव, समस्त पीठ प्रमुख, विभागाध्यक्ष, समस्त संकाय सदस्य, गैर-शैक्षणिक सदस्य, अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।

विद्यार्थियों में समारोह को लेकर विशेष उत्साह और उल्लास दिखाई दिया। उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्राप्त करने के गौरवपूर्ण क्षणों ने उनके भीतर नई ऊर्जा और भविष्य के प्रति आत्मविश्वास का संचार किया।

उपराष्ट्रपति ने सभी उपाधिधारकों, उनके अभिभावकों, आचार्यों और विश्वविद्यालय परिवार को बधाई देते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यहां से निकलने वाली नई पीढ़ी ज्ञान, संस्कार और कौशल को राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाकर भारत की ज्ञान-परंपरा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी।

राष्ट्रगान के साथ द्वितीय दीक्षांत समारोह का गरिमापूर्ण समापन हुआ।

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