
ऋषिकेश। महर्षि दधीचि ने असुरों के संहार हेतु अपने शरीर का त्याग कर अस्थियों का दान किया था। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए चमोली जनपद के एक दंपत्ति ने अपने 9 दिन के नवजात शिशु की मृत्यु के बाद देहदान कर मानवता की एक प्रेरणादायक मिसाल प्रस्तुत की है। यह देहदान मेडिकल छात्रों की शिक्षा, अध्ययन एवं शोध के उद्देश्य से किया गया, ताकि भविष्य में चिकित्सक ज्ञान अर्जन कर रोगों के संहार में सक्षम बन सकें।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2 जनवरी को चमोली निवासी संदीप राम की पत्नी श्रीमती हंसी ने श्रीनगर में एक नवजात शिशु को जन्म दिया। जन्म के बाद शिशु में जन्मजात महावृहदान्त्र (हिर्शस्प्रुंग रोग) पाया गया, जिसमें आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया) का अभाव था। भारत में यह रोग अपेक्षाकृत दुर्लभ होने के कारण नवजात को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया।
एम्स ऋषिकेश में नवजात का ऑपरेशन कर उसकी जान बचाई गई, किंतु ऑपरेशन के तीन दिन बाद, बीते रविवार को नवजात की रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के कारण मृत्यु हो गई। अपने जिगर के टुकड़े को खोने से परिवार पर दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।
अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को लेकर परिजनों ने एम्स ऋषिकेश के सीनियर नर्सिंग ऑफिसर मोहित एवं महिपाल से जानकारी प्राप्त की। उन्होंने आगे मार्गदर्शन हेतु मोहन फाउंडेशन, उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा से संपर्क किया।
अरोड़ा, जो पूर्व में दो नवजातों का देहदान करवा चुके हैं, नेत्रदान कार्यकर्ता एवं लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग के साथ एम्स पहुंचे। अरोड़ा ने परिवार को जानकारी दी कि छोटे बच्चों का पारंपरिक अंतिम संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें गंगा में प्रवाहित या दफनाया जाता है। इसके अतिरिक्त, देहदान के माध्यम से मेडिकल छात्रों की शिक्षा में सहयोग किया जा सकता है। इस पर परिवार ने सहर्ष देहदान के लिए अपनी सहमति प्रदान की।
सहमति मिलने के पश्चात अरोड़ा ने एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉ. मुकेश सिंगला एवं प्रोफेसर डॉ. रश्मि मल्होत्रा से संपर्क किया। उनके निर्देशन में तकनीकी सहायक अजय रावत द्वारा आवश्यक कागजी कार्यवाही पूर्ण कर नवजात की देह विभाग को सौंपी गई।
देहदान के समय उपस्थित डॉक्टर राजू बोकन, अजय रावत, ऋषभ पंचाल, विजय जुनेजा, अरुण शर्मा, सुरेश, स्नेह कुमारी, रूपेंद्र एवं नेहा सकलानी ने नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।










